फ़र्क
तू है तो ज़ायका है खाने में
तू नहीं तो नमक नहीं किसी बात में
तू है तो घर लगता है ये घर
तू नहीं तो... लौटने की क्या ज़रूरत
· · ·
तू होती है तो सोचता हूँ क्या बनाऊँ
कुछ नया, कुछ ख़ास, तेरे लिए सजाऊँ
तू नहीं है तो रात को ये होता है —
मैगी का पैकेट और ख़ुद से पूछना... "काफ़ी है"
तू है तो ज़ायका है खाने में
तू नहीं तो नमक नहीं किसी बात में...
· · ·
तू होती है तो फूल दिखते थे रंगीन
ख़ुशबू थी कुछ, आँखें ठहरती थीं वहीं
तू नहीं है तो वही बगीचा है, वही पत्ते
सूखे, पीले — और मुझे पड़ी नहीं कोई
तू है तो ज़ायका है खाने में
तू नहीं तो नमक नहीं किसी बात में...
· · ·
तू होती है तो घड़ी देखता था बार-बार
जल्दी निकलूँ, जल्दी पहुँचूँ, तू है इंतज़ार
तू नहीं है तो काम में ही डूबा रहता हूँ
देर हो जाए... घर जाना टालता रहता हूँ
तू है तो ज़ायका है खाने में
तू नहीं तो नमक नहीं किसी बात में...
· · ·
तू होती है तो बातें होती थीं बेवजह
ज़रूरी न हो तो भी, थमता नहीं था सिलसिला
तू नहीं है तो बैठा हूँ चुपचाप यहाँ
जाने क्या कहूँ... और कहूँ भी किससे अब
· · ·
तू है तो ज़ायका है खाने में
तू नहीं तो नमक नहीं किसी बात में
तू है तो घर लगता है ये घर
तू नहीं तो...
बस गुज़ारा है।
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